नमस्कार,बहुत दिन हो जा रहे हैं आजकल..कुछ लिखने का समय नहीं निकाल पा रही हूं....जानती हूं कि ये ठीक नहीं है..बहुत तेजी से ब्लॉग का संसार फल फूल रहा है...ऐसे में इतना gap ठीक नहीं है....जबकि इस बीच महिलाओं और समाज को लेकर इतना कुछ हो गया....तमाम खबरों के बीच संबंध बनाने को लेकर उम्र का तनाव बेमतलब ही नौजवानों को दे दिया सरकार ने.....क्या कभी ये चीजें उम्र की सीमा में बंधकर हुई हैं...या होती हैं..या कभी होंगी..बेकार ही तमाम बुद्धजीवियों ने अपनी जुबान और दिमाग दोनों को खर्च किया...टीवी चैनल पर बहस होता रहा....लेकिन अभी तक मुझे समझ में नहीं आया कि आखिर ऐसी क्या जरुरत आ पड़ी थी सरकार को कि इस मुद्दे को उछाल दिया....अगर आप लोगों को समझ में आया हो तो मुझे जरुर बताइएगा..कोशिश करुंगी अलग-अलग नजरिए को समझने की....
शुक्रवार, 22 मार्च 2013
सोमवार, 1 अक्टूबर 2012
आज भी प्रासंगिक है गांधी
आज भी गांधी का ही सहारा है...हमारे देश में अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा.....गांधीजी के अहिंसक रास्ते को अपनाते हुए अनशन और सादगीपूर्ण आग्रह के जरिए उन्होनें जो कोशिश की.. उससे देश की जनता को एक उम्मीद बंधी थी कि शायद देश के हालात बदलेंगे...कुछ सकारात्मक बदलाव दिखेगा...आजादी की लड़ाई की तरह ही एक लहर जनता में दौड़ी..देश भर की जनता इस कदर एकजुट हो गई कि हुक्मरानों के पसीने छूट गए...लेकिन इन दोनों लड़ाई में एक बड़ा फर्क है....तब लड़ाई विदेशी तत्वों के खिलाफ थी...आज लड़ाई अपनों के ही खिलाफ है...ऐसे में हालात ज्यादा विकट है...भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना ज्यादा मुश्किल है....हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां हर कदम पर भ्रष्टाचार है...स्कूल में एडमिशन से लेकर अस्पताल में भर्ती करवाने तक हर जगह भ्रष्टाचार है....ये इस कदर हमारे समाज में अपनी जड़े जमा चुका है...हमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी मिलनी मुश्किल है.....पिछले दिनों जिस तरह अन्ना की लहर फैली....उसके पीछे वजह भी यही थी कि लोगों को अन्ना में गांधी का स्वरुप दिखा....कई मुद्दों पर मै व्यक्तिगत तौर पर गांधी जी से इत्तेफाक नहीं रखती..लेकिन हमें ये तो मानना ही होगा कि आजादी के इतने बरसों बाद खासतौर पर युवाओं के मन में आज भी गांधीजी बसते हैं..शायद यही वजह थी कि दिल्ली में इतने बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए....साथ ही हमें ये भी मानना होगा कि हमारे भारतीय समाज में जाति-पांति ..छूआछूत में जो भी कमी आज आई है उसमें गांधीजी के योगदान को इंकार नहीं किया जा सकता....आम आदमी आज भी गांधीजी की विचारधारा को मानता हैं...उससे खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है...गांधीजी आज भी प्रासंगिक है....बापू अपने समय से बहुत आगे तक देखने वाले विश्व के एक विलक्षण नेता थे...यही वजह है कि उन्हें पूरे संसार में प्रतिष्ठा मिली...आज गांधी एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचारधारा हैं...जिस पर अगर अमल किया गया होता तो हमारा देश ना सिर्फ शक्तिशाली होता बल्कि आज के हालात से भी गुजरना नहीं पड़ता...लोकतंत्र के नाम पर आज जो गलत ढंग से राजनीति की जा रही है...शायद वो ना होती....कुछ तो शुचिता बरकरार रहती.....गांधीजी मानते थे कि किसी भी देश पर नागरिक का शासन चलता है....लोकतंत्र का निर्माण लोग करते हैं...गांधीजी की नीतियां देश के समग्र हित और कल्याण पर आधारित थी...आज उन नीतियों की जरुरत दिखती है...गांधी की जरुरत स्वाधीनता संघर्ष के समय जितनी थी उससे कहीं ज्यादा आज है....गांधी जब अंग्रेजों की साम्राज्यावादी नीतियों के खिलाफ अनशन पर बैठते थे तक हिंदुस्तान में लाखों लोग उनके साथ अनशन पर बैठते थे....चाहे अपने-अपने गांवों में ही सही...कहते हैं जब अंग्रेजी हूकूमत का अंतिम वायसराय माउंटबेटन हिंदुस्तान पहुंचा तो महात्मा गांधी बिहार के किसी हिस्से में लोगों को धार्मिक सहिष्णुता बनाए रखने के लिए पहुंचे थे..उसने पंडित नेहरू से पूछा कि हिंदुस्तान संकट से गुजर रहा है और गांधी राजधानी में नहीं है.....नेहरू का जवाब था महात्मा जहां होते हैं उस वक्त वहीं देश की राजधानी होती है...दरअस्ल बापू का पूरा व्यक्तित्व अपने देश में निहित व्यक्ति का व्यक्तित्व था...गांधी का कहना था कि सरकार को वही कार्य करने चाहिए जिसका फायदा समाज की सबसे नीची सीढ़ी पर खड़ा हुआ कमजोर वर्ग उठा सके....आज के सरकारी कार्यो का तंत्र क्या कहीं से भी इस सोच से मेल खाता हुआ दिखता है...गांधी जनता के दिलों तक इसीलिए पहुंच सके क्योंकि उन्होनें लोगों के दुख दर्द को समझने के लिए अपने को उन्हीं परिस्थितियों में रखा......मार्क्स ने कहा है कि यूं तो दार्शनिकों ने कई प्रकार से संसार की व्याख्या की है..लेकिन सवाल ये है कि उसे बदलेगा कौन ? संसार भऱ में चाहे जैसी भी क्रांतियां हुई हो सभी में क्रांति का नायक ही सत्ता के विध्वंस के बाद नई सत्ता पर आसीन हुआ है....लेनिन हो या माओ सबने इसी फॉर्मूले पर काम किया है....लेकिन गांधी एक अपवाद हैं...उन्हीं की परंपरा के नेता जयप्रकाश नारायण और लोहिया ने भी उनका अनुकरण किया था...ये अलग बात है कि उनके आंदोलन का फायदा उठाकर उनके ही चेले आज सत्ता पर कायम है...चाहे गांधी के सरनेम का सहारा हो या फिर लोहिया-नारायण की परंपरा निभाने का दम भरने वाले....अन्ना के साथ भी कुछ यही किया जा रहा है...ये अलग बात है कि आज जो लोग सत्ता तक पहुंचने का रास्ता अन्ना के आंदोलन को बनाना चाहते हैं उनमें धैर्य की कमी है...उन्हें लंबा आंदोलन चलाने के बाद...आंदोलन को सत्ता की सीढ़ी बनाने का धैर्य नहीं है... वो मैगी की तरह अपनी भूख तुरत-फुरत मिटाना चाहते हैं.....प्रतिभा राय
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| आज तुम्हारी ज़रुरत ज्यादा है बापू |
बुधवार, 7 मार्च 2012
साहस और सामर्थ्य ही बैठाएगा फलक पर
बात पिछले साल की है....जहां एक तरफ
पूरे देश भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर महिलाओं के सम्मान
और उत्थान के लिए तमाम कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे थे.. वहीं मध्यप्रदेश में छतरपुर
के हमां गांव में एक महिला को आग के हवाले कर दिया गया। संध्या नामक इस महिला की
ग़लती सिर्फ इतनी थी कि उसने अपनी अस्मत बचाने के लिए घर में घुस आए चार बदमाशों
का मुकाबला किया..नाराज़ बदमाशों ने उस पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दिया,आखिरकार
ज़िंदगी-मौत के बीच जूझते हुए उसने दम तोड़ दिया। ऐसा नहीं है कि ये अकेली घटना
है....हर बरस तमाम ऐसी घटनाए होती रहती हैं.....और हम तमाम इस तरह की घटनाओं से हम अक्सर रुबरु होते
रहते हैं और प्रशासन को कोस कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं....इस पूरे
वाकये में सबसे बड़ी बात ये है कि गांव में ऐसी घटना होती है.. और उस महिला को
बचाने के लिए कोई आगे नहीं आता। शहर के बड़े पॉश कॉलोनियों में आस-पास के लोगों को
एक दूसरे की खबर नहीं होती ये तो समझ में आता है,क्योंकि विकास की सीढ़ी चढ़ते
तथाकथित संभ्रांत लोग मिलने-जुलने में विश्वास नहीं करते।लेकिन गांव..जहां चूल्हे
भी एक दूसरे की आग से जलती थी..वहां सरेआम ऐसी घटनाए हो जाती हैं और लोग मदद को
आगे नहीं आते।..ये घटना या यूं कहें कि ऐसी घटनाएं हमारे समाज के बदलते ढ़ांचे की
तरफ इशारा करते हैं...ऐसे हालात में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ये विचार करने
की ज़रुरत है कि आज के बदलते परिपेक्ष्य महिलाओं को किस चीज की ज़रुरत है....मेरे
हिसाब से आज महिलाओं को ज़रुरत है सामर्थ्यवान बने ...साहसी बने... क्योंकि हर जगह पुलिस और प्रशासन मदद करने नहीं
पहुंचेगा...उसका खुद का साहस और संबल ही ऐसी घटनाओं से बचा सकेगा।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर तमाम
कार्यक्रम करके ये मान लिया जाता है कि महिला उत्थान हो गया...पर क्या वास्तव में गंभीरता
से किसी ने जानने की कोशिश की एक महिला क्या चाहती है ?..कैसा विकास चाहती है ? आज अक्सर एक
आवाज़ सुनाई देती है कि महिलाएं आज़ादी का दुरुपयोग कर रही है..बताएं कि समाज ये
क्यों उम्मीद करता है कि महिला हमेशा अच्छा ही करेगी..आखिर वो भी तो हैं हाड़-मांस
की ही इंसान...कुछ अच्छा करेगी तो कुछ बुरा भी ..आखिर हमेशा उसे रस्सी की डोर पर
चढ़ा,उसकी चाल पर निगाह क्यों रखी जाती है,भई चलेगी तो गिरेगी भी... सम्हलेगी
भी..उसे जीने दो ।मशहूर मनोचकित्सक सिगमंड फ्रायड का एक बयान बहुत मशहूर है कि “मनोविश्लेषण के
क्षेत्र में इतने साल काम करने के बाद भी मै समझ नहीं पाया कि स्त्री आखिर चाहती
क्या है?” फ्रायड अपने पेशे के दौरान सैकड़ों पुरुषों और स्त्रियों के
संपर्क में आए।उन दिनों स्त्रियां ही मनोचिकित्सक के पास ज्यादा आती थी।अब सभ्यता
का प्रसार कुछ इस तरह से हो रहा है कि मनोचिकित्सक के यहां महिलाओं की अपेक्षा
पुरुष ज्यादा आने लगे हैं।फ्रायड के लिए स्त्री हमेशा से ही रहस्य बनी रही
है।स्त्री वास्तव में क्या चाहती है,यह इसलिए स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उसे अपनी
मर्जी से चाहने की छूट उसे कभी नहीं मिली है..अब धीरे-धीरे परतें खुल रही है।उसे
आज आज़ादी मिली है,सोचने-समझने विचरने के लिए खुला आसमान मिल रहा है..हां ये ज़रूर
है कि इस राह पर कभी चलते हुए कांटे मिलते हैं तो कभी फूलों की सेज़..कभी
सफलता..तो कभी असफलता..कहीं भटकाव भी हैं सदियों से पराधीन रही नारी को उड़ान भरते
देखना किसी को अच्छा भी लग सकता है..किसी को बुरा भी....
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर अगर कुछ करना ही चाहते हैं तो उसके आसमान को साफ
करें और उड़ान भरने में मदद करते हुए सामर्थ्यवान बनाए...संबल बनाए....साहसी
बनाए..ताकि आए दिन आने वाली चुनौतियों का सामना कर सके,ताकि कोई उसे अबला समझ कर
उसकी इज्जत ना लूट सके,ना ही आग के हवाले कर सके।
रविवार, 8 अगस्त 2010
क्या यही है आज़ादी ?
दृश्य नंबर 1- लड़की का पिता मिठाई-फल लेकर..दो बड़ी कार में अपने कुछ भारी-भरकम रिश्तेदारों के साथ एक वर की तलाश एक परिवार में मिलने जाता है…(ये सारे तामझाम किए जाते हैं इम्प्रेशन जमाने के लिए..जैसा आप सभी समझ रहे हैं)..
दृश्य नंबर 2- लड़के के घर में भी लड़की वालों के स्वागत के लिए काफी इंतज़ाम किया गया है. लड़की के पिता अपने रिश्तेदारों के साथ बैठक में दाखिल हो रहे हैं…जलपान वगैरह के साथ राजनीति..वगैरह पर चर्चा हो जाने के बाद दोनों पक्ष के लोग मुख्य मुद्दे पर आते हैं..यानी लड़की के बारे..लड़के के बारे में बातचीत..जो इस पूरी कवायद का मुख्य एजेंडा है…कई बातों के बीच लड़के के पिता ने पूछा कि आपकी बेटी तो नौकरी कर रही है..मेरा बेटा तो ऐसी नौकरी में है जहां अक्सर तबादला होता रहता है.ऐसे में क्या आपकी बेटी नौकरी करती रहेगी….लड़की के पिता का तुरंत जवाब आता है कि ये तो आपकी मर्जी है साहब..शादी के बाद तो उसे क्या करना है,क्या नहीं करना है उसका निर्णय तो आप ही लेंगे. थोड़ी और बातचीत के बाद..सोच कर बताते हैं…पहले कुंडली मिलवा लेते हैं…बड़े भाई साहब से पूछ लेते है..बेटा भी आ जाए फिर लड़की देख ले…वगैरह-वगैरह..लड़की का पिता स्प्रिंग लगे गुड्डे के तरह लगातार हां..हां..में सर हिलाता हुआ..वहां से विदा ले लेता है..
दृश्य नंबर 3- लड़की की मां से पिता सारी बातों के बारे में खुश होकर बताता है..और पॉजिटिव रिस्पांस लग रहा है ..ऐसा कहकर आगे की तैयारी में जुट जाता है.लड़की दूसरे कमरें में बैठी सारी बात सुन रही है..वो अचानक अपने पिता के सामने आकर कहती है कि आपने ये कैसे कह दिया पापा कि आगे मै क्या करुंगी,क्या नहीं, इसका फैसला वो लोग लेंगे…फिर मेरी रात भर जागकर पढ़ाई करने का क्या मतलब हुआ..दिन-रात अथक परिश्रम करके जो मैने अपने बूते पर नौकरी पायी है,उसका क्या मतलब..जब कैरियर बनाने का निर्णय मेरा था,मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने का निर्णय मेरा था..नौकरी करते रहने का फैसला उनका कैसे हो सकता है…क्या आपने भी लड़के के पिता से पूछा कि आपके बेटे से मेरी बेटी की तनख्वाह ज्यादा है क्या शादी के बाद नौकरी छोड़ने का निर्णय उनका बेटा ले सकता है ?
पिता अवाक रह जाता है…उसके सामंती दिमाग में अपनी आज्ञाकारी बेटी के ऐसे रुप की उम्मीद नहीं थी..लेकिन फिर अपने को सम्हालते हुए कहता है कि बेटीअच्छा घर वर है..ऐसी बाते तो करनी ही पड़ती हैं..आखिर सब तेरे खुशी के लिए ही तो कर रहा हूं..लड़की फिर बिफरती है कि आपको कैसे पता कि मेरी खुशीकिसमें हैं..आपने कभी पूछा…सिर्फ पढ़ने की आज़ादी दी..नौकरी करने की,चुनने की आज़ादी दी…आप कैसे भूल गए कि इस आज़ादी में मेरी भावनाएं आज़ाद नहींहुई होगी…इस पूरे सफर में कोई ऐसा नहीं मिला होगा..जिससे मै भावनात्मक रुप से जुड़ भी सकती हूं…आपकी खुशी के लिए मै आप के हिसाब के लड़के से शादी तो कर सकती हूं..लेकिन नौकरी नहीं छोड़ सकती? लड़की का पिता सदमे की हालत में है….
लड़की के इस एलान के बाद घर में उसी तरह रिएक्शन है..जैसे भारत-पाक शांति वार्ता के बाद…पिता पहले तो उस पर पाकिस्तानी अंदाज़ में तमाम आरोप मढ़ता है..कुढ़ता हैं…कि आखिर इतनी आज़ादी दी ही क्यों…इतना पढ़ाया-लिखाया क्यों…फिर अपना राग अलापने लगता है बेटी मैने ज़िंदगी भर तुम लोगों को कोई कमी नहीं होने दी…कुल मिलाकर पिता फिर मां को बिचौलिया बना कर अपनी बात मनवाने की कवायद शुरु कर देता है….
लब्बोलुआब यही है कि अभी बदलाव लाने में…आज़ादी के मायने समझने-समझाने में कई बरस और लगेंगे..चाहे वो आम ज़िंदगी में हो या फिर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर…देश के राजनीतिज्ञों और अफसरों से भी यही गुजारिश है कि अवाम को क्या पसंद है क्या पसंद नहीं है इसका निर्णय वो कैसे ले सकते हैं….भारत-पाक के अवाम से पूछ कर देखिए….वोटिंग करवा लीजिए..शांति वार्ता का सबसे आसान तरीका मिल जाएगा….
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
'विवाहेत्तर संबंधों' की वजह से भूकंप !
एक खबर हाल ही में पढ़ी है आप भी पढ़िए, ईरान के एक कट्टरपंथी मौलवी ने दावा किया है कि 'विवाहेत्तर संबंधों' की वजह से भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं।
ब्रिटिश समाचार पत्र 'द टेलीग्राफ' ने कट्टरपंथी मौलवी अयातुल्लाह काजेम सिद्दीकी के हवाले से खबर प्रकाशित की है। मौलवी ने कहा आधुनिक परिधानों में महिलाओं को देखकर युवक गुमराह हो जाते हैं, जिससे कई प्राकृतिक आपदाएं, जैसे भूकंप की संभावना बढ़ जाती है।"कई महिलाएं सलीके से कपड़े नहीं पहनती हैं, ऐसे में युवा गुमराह हो जाते हैं और समाज में विवाहेत्तर संबंधों की घटनाएं बढ़ जाती है। "
इस खबर को पढ़ने के बाद यही लग रहा है कि सारा भूगोल बेकार है। पर्यावरण विज्ञान और धरती-आसमान को एक करने वालों को ये सोचना चाहिए कि अब महिलाओं को कैसे कपड़े पहनाएं और कैसे कैद करके रखें ताकि भूकंप ना आए।
जापान-गुज़रात के लोगों को खास तौर पर सचेत हो जाना चाहिए। विवाहेत्तर संबंध पुरुष बनाता है तो कोई जलज़ला नहीं आता,लेकिन अगर वहीं महिला बनाए तो भूकंप आने की संभावना बढ़ जाती है। भूकंपरोधी विषय पर काम कर रहे लोगों को बधाई कि इससे आसान उपाय भूकंप रोकने का कोई नहीं हो सकता कि सभी जवान-ज़हीन महिलाओं को मिट्टी में गाड़ तो या बंद कोठरी में कैद कर दो।
समाज की भलाई के लिए सभी महिलाएं सहर्ष तैयार हो जाऐंगी......
मंगलवार, 13 अप्रैल 2010
आखिर किस सम्मान के लिए "ऑनर किलिंग"

हरियाणा और आसपास के राज्यों की खाप पंचायतों की शीर्ष संस्था ने 'ऑनर किलिंग' (कथित सम्मान के लिए की जाने वाली हत्या) के अपराध में पिछले महीने मौत की सजा पाए छह लोगों को अपना समर्थन देने का फैसला किया है।
खाप महापंचायत ने मंगलवार को हिंदू विवाह कानून में एक संशोधन करके समान गोत्र में विवाह को प्रतिबंधित करने की भी मांग की। खाप नेताओं ने न्यायालय के निर्णय के विरोध में दिल्ली को उत्तर भारत के महत्वपूर्ण शहरों से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर एक पर प्रदर्शन करने और चण्डीगढ़ तथा अंबाला में सड़क जाम करने का फैसला किया। असंतुष्ट खाप नेता राज्य सरकार के खिलाफ टकराव की ओर बढ़ रहे हैं।
इस खबर को पढ़ने के बाद एक आस टूट गई। आस थी कि शायद हम ऑनर किलिंग के कलंक से जल्द ही छुटकारा पा लेंगे।
ये आस तब जगी थी कि जब ऑनर किलिंग के नाम पर प्रेमी और विवाहित जोड़ों की क्रूर हत्याओं को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर पहल हुई थी। केंद्र सरकार देश में कथित तौर पर बढ़ते ऑनर किलिंग को रोकने के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में संशोधन करने की बात की गई। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव को कानून मंत्रालय ने हरी झंडी दे दी।
आज आस टूटने की बात इसलिए आ रही है क्योंकि सरकार और समाज ही वो दो सिरे हैं,जो इस सामाजिक-आपराधिक कलंक से निपटने के लिये सीधे तौर पर ज़िम्मेदार होते हैं।
सरकार अगर कानूनी तौर पर कड़ाई करे तो भी एक हाथ से ताली बजाने वाली बात होगी....क्योंकि सरकार के पास कोई प्रत्यक्ष कानून नहीं है, और समाज आज भी महिला को जाति सूचक शर्म की वस्तु समझने की अंधी सोच से बाहर नहीं निकल पा रहा है। तभी तो जब करनाल की एक अदालत ने पिछले महीने समान गोत्र में विवाह करने वाले मनोज और बबली की हत्या करने का दोषी करार देकर पांच लोगों को मौत की सजा सुनाई तो राज्य सरकार के खिलाफ बगावती तेवर दिखाने के साथ-साथ हिंदू विवाह कानून में संशोधन करने की भी मांग कर डाली।
ज्यादातर मामलों में हत्या का ये आदेश गांव की जाति पंचायत सुनाती है,जिसे खाप के नाम से जाना जाता है,खाप गांवोंमें चलने वाली समानांतर अदालत होती है,जो खुद को सारे सामाजिक क्रिया-कलापों का ठेकेदार समझती है।
ऑनर किलिंग के इन मामलों का बुनियादी कारण औरत होती है,जिसे समुदाय की मर्यादा से जोड़कर देखा जाता है,इसलिए पुरुष प्रधान समाज में उसे खुद अपने फैसले लेने का अधिकार भी नहीं होता। खाप अपने समुदाय की स्त्रियों पर पहरा रखती है और समाज के लड़के से उसके प्रेम को अपमान मानकर उनकी हत्या के फरमान जारी कर देती है।
इन पंचायतों पर धन और बल वालों का हाथ होता है,इसलिए अक्सर इनका फैसला भी कमज़ोर लोगों के खिलाफ ही होता है,जिसे मानना अनिवार्य होता है। गांव की चुनी हुई पंचायतें इन जाति पंचायतों के सामने गूंगी होती हैं,और प्रशासन अपंग बना रहता है। धर्म, संस्कृति और स्त्रियों के भविष्य निर्धारित करने वाले खाप के स्वयंभू पंच प्रेमी जोड़ों को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाने, फांसी चढ़ा देने या जला कर मार देने की सज़ा सुनाते रहे हैं।
सवाल ये है, कि दशकों से जारी इस कलंक पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है ? इसका जवाब शायद उन सामाजिक कुरीतियों की जड़ में छिपा है,जिन्हें धर्म,जाति और समुदायों का अधिकार समझा जाता है,और जिन्हें राजनीतिक कारणों से कुरेदने की हिम्मत सरकारें नहीं कर पातीं। मासूम बेटे-बेटियों को सज़ा-ए-मौत सुनाने वाली इन जाति पंचातयों पर प्रतिबंध लगाने से सरकारें हिचकती रही हैं,और पुलिस इन गैरकानूनी सार्वजनिक अदालतों के फैसलों पर अपनी सीमित परिभाषाओं के तहत परिणामविहीन कार्रवाई करता रहा है। इस साल जुलाई में खुद संसद में ऑनर किलिंग के मुद्दे पर खूब हंगामा हुआ,लेकिन तब नतीज़ा ढ़ाक के तीन पात ही रहा था।
ये खाप महापंचायते कानून और सरकार से ऊपर हैं क्या, आज ये न्यायालय के निर्णय को भी ना मानते हुए लामबंद हो रहे हैं। कहीं ये भोर के उजाले के पहले अंधेरे की छटपटाहट तो नहीं है..।
खाप महापंचायत ने मंगलवार को हिंदू विवाह कानून में एक संशोधन करके समान गोत्र में विवाह को प्रतिबंधित करने की भी मांग की। खाप नेताओं ने न्यायालय के निर्णय के विरोध में दिल्ली को उत्तर भारत के महत्वपूर्ण शहरों से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर एक पर प्रदर्शन करने और चण्डीगढ़ तथा अंबाला में सड़क जाम करने का फैसला किया। असंतुष्ट खाप नेता राज्य सरकार के खिलाफ टकराव की ओर बढ़ रहे हैं।
इस खबर को पढ़ने के बाद एक आस टूट गई। आस थी कि शायद हम ऑनर किलिंग के कलंक से जल्द ही छुटकारा पा लेंगे।
ये आस तब जगी थी कि जब ऑनर किलिंग के नाम पर प्रेमी और विवाहित जोड़ों की क्रूर हत्याओं को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर पहल हुई थी। केंद्र सरकार देश में कथित तौर पर बढ़ते ऑनर किलिंग को रोकने के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में संशोधन करने की बात की गई। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव को कानून मंत्रालय ने हरी झंडी दे दी।
आज आस टूटने की बात इसलिए आ रही है क्योंकि सरकार और समाज ही वो दो सिरे हैं,जो इस सामाजिक-आपराधिक कलंक से निपटने के लिये सीधे तौर पर ज़िम्मेदार होते हैं।
सरकार अगर कानूनी तौर पर कड़ाई करे तो भी एक हाथ से ताली बजाने वाली बात होगी....क्योंकि सरकार के पास कोई प्रत्यक्ष कानून नहीं है, और समाज आज भी महिला को जाति सूचक शर्म की वस्तु समझने की अंधी सोच से बाहर नहीं निकल पा रहा है। तभी तो जब करनाल की एक अदालत ने पिछले महीने समान गोत्र में विवाह करने वाले मनोज और बबली की हत्या करने का दोषी करार देकर पांच लोगों को मौत की सजा सुनाई तो राज्य सरकार के खिलाफ बगावती तेवर दिखाने के साथ-साथ हिंदू विवाह कानून में संशोधन करने की भी मांग कर डाली।
ज्यादातर मामलों में हत्या का ये आदेश गांव की जाति पंचायत सुनाती है,जिसे खाप के नाम से जाना जाता है,खाप गांवोंमें चलने वाली समानांतर अदालत होती है,जो खुद को सारे सामाजिक क्रिया-कलापों का ठेकेदार समझती है।
ऑनर किलिंग के इन मामलों का बुनियादी कारण औरत होती है,जिसे समुदाय की मर्यादा से जोड़कर देखा जाता है,इसलिए पुरुष प्रधान समाज में उसे खुद अपने फैसले लेने का अधिकार भी नहीं होता। खाप अपने समुदाय की स्त्रियों पर पहरा रखती है और समाज के लड़के से उसके प्रेम को अपमान मानकर उनकी हत्या के फरमान जारी कर देती है।
इन पंचायतों पर धन और बल वालों का हाथ होता है,इसलिए अक्सर इनका फैसला भी कमज़ोर लोगों के खिलाफ ही होता है,जिसे मानना अनिवार्य होता है। गांव की चुनी हुई पंचायतें इन जाति पंचायतों के सामने गूंगी होती हैं,और प्रशासन अपंग बना रहता है। धर्म, संस्कृति और स्त्रियों के भविष्य निर्धारित करने वाले खाप के स्वयंभू पंच प्रेमी जोड़ों को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाने, फांसी चढ़ा देने या जला कर मार देने की सज़ा सुनाते रहे हैं।
सवाल ये है, कि दशकों से जारी इस कलंक पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है ? इसका जवाब शायद उन सामाजिक कुरीतियों की जड़ में छिपा है,जिन्हें धर्म,जाति और समुदायों का अधिकार समझा जाता है,और जिन्हें राजनीतिक कारणों से कुरेदने की हिम्मत सरकारें नहीं कर पातीं। मासूम बेटे-बेटियों को सज़ा-ए-मौत सुनाने वाली इन जाति पंचातयों पर प्रतिबंध लगाने से सरकारें हिचकती रही हैं,और पुलिस इन गैरकानूनी सार्वजनिक अदालतों के फैसलों पर अपनी सीमित परिभाषाओं के तहत परिणामविहीन कार्रवाई करता रहा है। इस साल जुलाई में खुद संसद में ऑनर किलिंग के मुद्दे पर खूब हंगामा हुआ,लेकिन तब नतीज़ा ढ़ाक के तीन पात ही रहा था।
ये खाप महापंचायते कानून और सरकार से ऊपर हैं क्या, आज ये न्यायालय के निर्णय को भी ना मानते हुए लामबंद हो रहे हैं। कहीं ये भोर के उजाले के पहले अंधेरे की छटपटाहट तो नहीं है..।
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
एक ही के साथ कैसे गुज़ार सकती हो?
जब मैने देश की राजधानी में पढ़ने के लिए एक संस्थान में दाखिला लिया,तो मुझ जैसी छोटे शहर की लड़की को तमाम तरह की सच्चाई से साबका पड़ा। कुछ तो वाकई फायदेमंद थी लेकिन कुछ के बारे में मै आज भी सोचती रहती हूं और जानने की कोशिश में जुटी रहती हूं कि क्या वाकई ये लड़कियां इतनी एडवांस थी..या फिर यूं ही बाते बनाने के लिए खुद को अपने कपड़ों की तरह ही बिंदास दिखाने के ऐसे स्टेटमेंट दे दिया करती थी। मै आज भी जानना चाहती हूं कि वो लड़किया कहां और कितनों के साथ, किस हाल में हैं? बात करीब दस साल पहले की है जब मेरे जीवन में दो घटनाएं किसी उल्कापात की तरह हुई। एक तरफ मेरी शादी हुई,दूसरी तरफ दिल्ली के एक संस्थान की प्रवेश परीक्षा का परिणाम आ गया..और मै इंटरव्यू देने के लिए दिल्ली आ गई। इंटरव्यू भी पास कर लिया और दाखिला ले लिया। मेरे लिए दोनों तरफ नया था...एक तरफ पारिवारिक तौर पर मै नई ज़िदगी में कदम रख रही थी..नए संबधों को जानने समझने की कोशिश में उलझी-सुलझी रहती थी(क्योंकि एक लड़की के लिए मायके से विदा होकर ससुराल की ड्योढ़ी पर कदम रखते ही उसकी दुनियां ही बदल जाती हैं...बोलने,समझने,समझाने का मिजाज बदल जाता हैं)
वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी के एक उच्च संस्थान में देश भर से आए छात्र-छात्राओं का साथ। छात्र-छात्राओं का उन्मुक्त व्यवहार..वैसै ही कपड़े...वैसे ही फैशन…पढ़ने की नई विधा...समझने की नई विधा..नए-नए तरह के प्रोफेसर,क्योकि हमारे शहर में साउथ इंडियन प्रोफेसर नहीं हुआ करते हैं। इनका अंदाज..खैर छोड़िए वो सब कभी और बताउंगी.. ।
मै एक तरफ अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी से सामंजस्य बिठा रही थी तो दूसरी तरफ इन सब चीज़ों के साथ ।
मुझे यहां के अधिकतर छात्र-छात्राएं बहुत ध्यान से देखते थे।इसकी वजह आप बिल्कुल ये ना समझें कि मै अपूर्व सुंदरी थी। जो चीज़े मुझे इन छात्र-छात्राओं से अलग करती थी...वो थी मेरी सिंदूर भरी मांग,कलाई में चूड़ियां..क्योंकि हमारे यहां रिवाज़ है कि कम से कम सवा महीने मांग और कलाई भरी होनी चाहिए।
कभी संस्थान के लॉन..तो कभी क्लास..कभी कैंटीन में आते-जाते कईयों से बातचीत होने लगी..नहीं तो स्माइल का ही आदान-प्रदान होने लगा। यहीं मैने सीखा कि टॉयलेट को “लू” कहते हैं...क्योंकि हम तो बॉथरुम और टॉयलेट ही कहते थें...जिस दिन “लू” शब्द का धमाका मेरे सामने हुआ..मै थोड़ी हकबकाई सी रह गई थी लेकिन अपने आपको स्मार्ट दिखाने और सब समझ रहीं हूं दिखाने की कोशिश में मैने.. या ,श्योर जैसे अंग्रेज़ीदा शब्दों से काम चला लिया। लेकिन हॉस्टल के अपने रुम में आते ही भार्गव की मोटी डिक्शनरी में शाब्दिक अर्थ ढ़ूढ़ने लगी..लेकिन वहां भी नहीं मिला...
खैर थोड़े दिनों बाद मै भी “लू” ही जाने लगी। ऐसी तो ना जाने कितनी ही यादें हैं। लेकिन जो बात अभी बतानी है वो है कि करीब बीस दिनों के बाद ही एक विस्फोट हुआ शब्दों का...एक अंग्रेजीदां,फैशनपरस्त,आधुनिक लड़कियों का ग्रुप जिनसे केवल स्माइल एक्सचेंज़ होती थी..उसमें से एक ने कहा हाय,हाउ आर यू? मैने कहा, फाइन...थोड़ी बहुत हॉस्टल और क्लास की बातों के बाद एक ने कहा, यू आर मैरिड...मैने पूछा इसलिए नहीं लिखा कि उसने कहा ही था...पूछा नहीं था..मै भी शादीशुदा होने की पूरे साजो-सामान से सुसज्जित थी..फिर क्यों ऐसा कह रही है..मेरे चेहरे पर थोड़ी झिझक, थोड़ी शर्म..का मिलाजुला पुट आया...इसके बाद तो उसने जो कहा वो मेरे जैसे मध्यमवर्गीय लड़की के लिए किसी विस्फोट जैसा ही था..उसने कहा कैसे पॉसिबल है कि तुम एक ही इंसान के साथ अपनी पूरी ज़िंदगी बिता दोगी?
मुझे तो जवाब देते ही नहीं बना..मै बस मुस्कुराह चेहरे पर चिपकाए...वहां से चली गई। लेकिन मुझे लगा कि ये लड़कियां कैसी बाते करती हैं? क्या सोच है इनकी ? मैने रात को पीसीओ बूथ पर जाकर लाइन में लगकर अपनी मम्मी को फोन किया(क्योंकि तब मोबाइल क्रांति नहीं आई थी,आधे-आधे घंटे बूथ पर तपस्या करनी पड़ती थी)मम्मी को कई बातों के साथ ये बात भी बतायी। मेरी मां ने चेतावनी और घबराए भरे लहज़े में कहा कि “देखो ऐसी लड़कियों से दूर रहना,दोस्ती ना करना..आज दस साल बीत जाने के बाद सोचती हूं कि कहां हैं वो लड़कियां ?
वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी के एक उच्च संस्थान में देश भर से आए छात्र-छात्राओं का साथ। छात्र-छात्राओं का उन्मुक्त व्यवहार..वैसै ही कपड़े...वैसे ही फैशन…पढ़ने की नई विधा...समझने की नई विधा..नए-नए तरह के प्रोफेसर,क्योकि हमारे शहर में साउथ इंडियन प्रोफेसर नहीं हुआ करते हैं। इनका अंदाज..खैर छोड़िए वो सब कभी और बताउंगी.. ।
मै एक तरफ अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी से सामंजस्य बिठा रही थी तो दूसरी तरफ इन सब चीज़ों के साथ ।
मुझे यहां के अधिकतर छात्र-छात्राएं बहुत ध्यान से देखते थे।इसकी वजह आप बिल्कुल ये ना समझें कि मै अपूर्व सुंदरी थी। जो चीज़े मुझे इन छात्र-छात्राओं से अलग करती थी...वो थी मेरी सिंदूर भरी मांग,कलाई में चूड़ियां..क्योंकि हमारे यहां रिवाज़ है कि कम से कम सवा महीने मांग और कलाई भरी होनी चाहिए।
कभी संस्थान के लॉन..तो कभी क्लास..कभी कैंटीन में आते-जाते कईयों से बातचीत होने लगी..नहीं तो स्माइल का ही आदान-प्रदान होने लगा। यहीं मैने सीखा कि टॉयलेट को “लू” कहते हैं...क्योंकि हम तो बॉथरुम और टॉयलेट ही कहते थें...जिस दिन “लू” शब्द का धमाका मेरे सामने हुआ..मै थोड़ी हकबकाई सी रह गई थी लेकिन अपने आपको स्मार्ट दिखाने और सब समझ रहीं हूं दिखाने की कोशिश में मैने.. या ,श्योर जैसे अंग्रेज़ीदा शब्दों से काम चला लिया। लेकिन हॉस्टल के अपने रुम में आते ही भार्गव की मोटी डिक्शनरी में शाब्दिक अर्थ ढ़ूढ़ने लगी..लेकिन वहां भी नहीं मिला...
खैर थोड़े दिनों बाद मै भी “लू” ही जाने लगी। ऐसी तो ना जाने कितनी ही यादें हैं। लेकिन जो बात अभी बतानी है वो है कि करीब बीस दिनों के बाद ही एक विस्फोट हुआ शब्दों का...एक अंग्रेजीदां,फैशनपरस्त,आधुनिक लड़कियों का ग्रुप जिनसे केवल स्माइल एक्सचेंज़ होती थी..उसमें से एक ने कहा हाय,हाउ आर यू? मैने कहा, फाइन...थोड़ी बहुत हॉस्टल और क्लास की बातों के बाद एक ने कहा, यू आर मैरिड...मैने पूछा इसलिए नहीं लिखा कि उसने कहा ही था...पूछा नहीं था..मै भी शादीशुदा होने की पूरे साजो-सामान से सुसज्जित थी..फिर क्यों ऐसा कह रही है..मेरे चेहरे पर थोड़ी झिझक, थोड़ी शर्म..का मिलाजुला पुट आया...इसके बाद तो उसने जो कहा वो मेरे जैसे मध्यमवर्गीय लड़की के लिए किसी विस्फोट जैसा ही था..उसने कहा कैसे पॉसिबल है कि तुम एक ही इंसान के साथ अपनी पूरी ज़िंदगी बिता दोगी?
मुझे तो जवाब देते ही नहीं बना..मै बस मुस्कुराह चेहरे पर चिपकाए...वहां से चली गई। लेकिन मुझे लगा कि ये लड़कियां कैसी बाते करती हैं? क्या सोच है इनकी ? मैने रात को पीसीओ बूथ पर जाकर लाइन में लगकर अपनी मम्मी को फोन किया(क्योंकि तब मोबाइल क्रांति नहीं आई थी,आधे-आधे घंटे बूथ पर तपस्या करनी पड़ती थी)मम्मी को कई बातों के साथ ये बात भी बतायी। मेरी मां ने चेतावनी और घबराए भरे लहज़े में कहा कि “देखो ऐसी लड़कियों से दूर रहना,दोस्ती ना करना..आज दस साल बीत जाने के बाद सोचती हूं कि कहां हैं वो लड़कियां ?
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