उड़ान पर आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है..ज़िंदगी का जंग जीतना है तो हौसला कायम रखिए..विश्वास करें सफलता आपके कदम चूमेगी..

महिला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महिला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

क्या आपके इलाके में डायन है ?

आज भी भारत में डायन जिंदा हैं....पहले बिजली नहीं था अंधेरा था 

इसलिए डायने होती थी...उस समय समय बिताने के लिए बतकही के 

अलावा कुछ और नहीं होता था इसलिए डायने होती थी..और भी 

तमाम वजहों से डायन होती थी...लेकिन जब अब जहां बिजली नहीं है 

वहां भी टीवी देखी जाती है तो बड़ी हैरत होती है कि आखिर तमाम 

तरह की दिन भर की मसालेदार खबरें,धारावाहिक होने के बावजूद 

कहां वक्त है कि डायन पैदा हो जाए....ये सब मुझे इसलिए कहना 

पड़ रहा है कि झारखंड के रांची के मांडर इलाके के कनीजिया गांव में 

एक दो नहीं बल्कि पांच-पांच डायने मिली हैं..वो भी जिंदा..ऐसे में 

सभी को अपने बच्चों और परिवार वालों का ख्याल रखना है...इसलिए 

गांववालों ने लाठी-डंडों से पीटकर पांचों को मार डाला...लेकिन हैरत 

की बात है कि जानी सुनी बातों के मुताबिक एक ही डायन पूरे गांव 

को खा जाने के लिए काफी होती है..पांचों ने किसी को खाया नहीं 

बल्कि सिर्फ लाठी-डंडों से ही मर भी गई...गोली-बंदूक..तांत्रिक किसी 

की जरूरत नहीं पड़ी...

ये गांव कोई बहुत सुदूर इलाके में भी नहीं है..बल्कि प्रदेश की 

राजधानी रांची से मात्र 20 किलोमीटर दूर है..मिली जानकारी के 

मुताबिक इन सभी डायनों की उम्र 32 से 50 साल के बीच है..अच्छा 

गांववालों ने उन्हें सिर्फ पीट-पीट कर मारा ही नहीं बल्कि उनके शवों 

को (शायद डायनों के शव भी होते होंगे या नहीं जो भी हो..) बोरे में 

भरकर गांव के बाहर फेंक दिया...फिर भी इन डायनों ने कुछ नहीं 

किया...क्या डायनें इंसानों से अधिक संवेदनशील या नख विहीन हो 

चुकी हैं...कहते हैं भूत-पिशाच के कैटेगरी की ही होती हैं डायने..इनके 

पास अपार शक्ति होती है..बावजूद इसके किसी गांववाले को खरोंच 

तक नहीं आई..इनमें गजब की ताकत होती है..नाराज यानि गुस्सा 

आने पर वह एक साथ कई लोगों को पछाड़ सकती हैं...लेकिन पांच-

पांच डायने इन गांववालों को बाल बांका भी नहीं कर सकी...इसका 

साफ मतलब ये निकाल लें कि तथाकथित सभ्य इंसान ज्यादा खूंखार 

हो चुका है..बनिस्पत डायनों के..हाय रे..मुझे तो अब इन इंसानों से 

डर लगने लगा है..इतना कुछ हो रहा था लेकिन किसी भी डायन ने 

लाल आंखे तरेरते हुए हवा में उड़ने की कोशिश नहीं की..औऱ ना ही 

किसी बच्चे तक को अपनी लंबी-लंबी नखों से चीरा....ना ही उनके मुंह 

में इंसानी खून दिखाई दिया..बल्कि खुद ही इस बुरी तरह घायल हो 

गई कि सिर्फ मुंह और सिर ही नहीं बल्कि शरीर के हर उस जगह से 

खून की फौहारे निकलने लगी जहां जहां लाठी पड़ी..हाय रे कनीजिया 

गांव के नौनिहालों वीरों जवानों तुम तो डायनों से अधिक खतरनाक 

निकले..आखिर तुम लोगों ने आज के आधुनिक जमाने में वो कर 

दिखाया जो शायद पुराने जमाने के अंधविश्वास से जकड़े समाज के 

लोग नहीं कर पाएं थे....इस गांव के सभी वीरों का ना सिर्फ सम्मान 

होना चाहिए बल्कि डायन भूत प्रेत पिशाच से पीड़ित हर उस जगह 

भेजने के लिए स्वात टीम की तर्ज पर इनका एक टॉस्क फोर्स बना 

देना चाहिए....देखिएगा हमारा दावा है कि न सिर्फ भारत से भूत 

पिशाच डायन का नाश होगा बल्कि विदेशों में भी इनकी सेवा ली 

जाएगी...

ये पांचों डायने मर चुकी है बावजूद इसके डर इतना अधिक है कि 

पुलिस को शव भी कब्जे में लेने का विरोध किया गया...और तो और 

गांव के कब्रगाह में उन्हें दफनाने का भी विरोध किया है..

अब जरा इस तथ्य पर गौर फरमा लें कि आखिर इन गांव वालों को 

कैसे पता चल गया कि उनके गांव में डायनों ने डेरा डाल लिया 

है...हुआ कुछ यूं कि कुछ दिन पहले गांव में दो तीन अधेड़ उम्र के 

लोगों की अज्ञात वजह से मौत हो गई थी...इसे माना गया कि डायनों 

की वजह से मौत हुई है..इतना ही नहीं डायनों के पड़ोस में रहने वाले 

एक युवक की पीलिया से मौत हो गई..बस क्या था...पहले एक डायन 

को पीटने से शुरु हुआ मामला चार और डायनों तक जा पहुंचा...डायनें 

बेचारी कुछ समझ पाती इससे पहले ही पांचों को डायनों को गांव के 

ही रणबांकुरों ने मार डाला...मारने वालों में कई इन्हें दीदी..भाभी और 

चाची भी कहते थे...अचानक पांचों डायन बन गई और प्रकोप फैलाने 

लगी तो गांववालों का फर्ज बनता था कि इनसे गांव को मुक्ति 

दिलाई जाए....

इतनी बड़ी घटना हो गई और जरा टीवी वालों को देखो...यूं तो हर 

छोटी बड़ी बात पर लाल-लाल गोले दिखाकर चिल्ला चिल्ला कर 

दिखाएंगे...लेकिन रांची के कनीजिया गांव वालों की इतनी बड़ी बहदुरी 

दिखाने की जहमत न की...मुझे लगता है आजकल साध्वी राधे मां के 

पुण्य प्रताप का दोहन करने में जुटी है मीडिया...अरे वहां थोड़ी 

लाली—चमकीली ज्यादा है ना....इसलिए इन वीरों की गाथा नहीं दिखा 

पाई....लेकिन घबराने की कोई बात नहीं..ये दल जल्द ही कुछ और 

जगहों पर धावा बोलने वाला है..जैसे ही कोई नई डायन हाथ लगी..तो 

कसम से देर नहीं लगेगी...सबको बुला लेंगे...फिर देखना हमारी ताकत 

के आगे कैसे घुटने टेकती हैं ये डायनें....

बुधवार, 7 मार्च 2012

साहस और सामर्थ्य ही बैठाएगा फलक पर

बात पिछले साल की है....जहां एक तरफ पूरे देश भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर महिलाओं के सम्मान और उत्थान के लिए तमाम कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे थे.. वहीं मध्यप्रदेश में छतरपुर के हमां गांव में एक महिला को आग के हवाले कर दिया गया। संध्या नामक इस महिला की ग़लती सिर्फ इतनी थी कि उसने अपनी अस्मत बचाने के लिए घर में घुस आए चार बदमाशों का मुकाबला किया..नाराज़ बदमाशों ने उस पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दिया,आखिरकार ज़िंदगी-मौत के बीच जूझते हुए उसने दम तोड़ दिया। ऐसा नहीं है कि ये अकेली घटना है....हर बरस तमाम ऐसी घटनाए होती रहती हैं.....और हम  तमाम इस तरह की घटनाओं से हम अक्सर रुबरु होते रहते हैं और प्रशासन को कोस कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं....इस पूरे वाकये में सबसे बड़ी बात ये है कि गांव में ऐसी घटना होती है.. और उस महिला को बचाने के लिए कोई आगे नहीं आता। शहर के बड़े पॉश कॉलोनियों में आस-पास के लोगों को एक दूसरे की खबर नहीं होती ये तो समझ में आता है,क्योंकि विकास की सीढ़ी चढ़ते तथाकथित संभ्रांत लोग मिलने-जुलने में विश्वास नहीं करते।लेकिन गांव..जहां चूल्हे भी एक दूसरे की आग से जलती थी..वहां सरेआम ऐसी घटनाए हो जाती हैं और लोग मदद को आगे नहीं आते।..ये घटना या यूं कहें कि ऐसी घटनाएं हमारे समाज के बदलते ढ़ांचे की तरफ इशारा करते हैं...ऐसे हालात में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ये विचार करने की ज़रुरत है कि आज के बदलते परिपेक्ष्य महिलाओं को किस चीज की ज़रुरत है....मेरे हिसाब से आज महिलाओं को ज़रुरत है सामर्थ्यवान बने ...साहसी बने...  क्योंकि हर जगह पुलिस और प्रशासन मदद करने नहीं पहुंचेगा...उसका खुद का साहस और संबल ही ऐसी घटनाओं से बचा सकेगा।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर तमाम कार्यक्रम करके ये मान लिया जाता है कि महिला उत्थान हो गया...पर क्या वास्तव में गंभीरता से किसी ने जानने की कोशिश की एक महिला क्या चाहती है ?..कैसा विकास चाहती है ? आज अक्सर एक आवाज़ सुनाई देती है कि महिलाएं आज़ादी का दुरुपयोग कर रही है..बताएं कि समाज ये क्यों उम्मीद करता है कि महिला हमेशा अच्छा ही करेगी..आखिर वो भी तो हैं हाड़-मांस की ही इंसान...कुछ अच्छा करेगी तो कुछ बुरा भी ..आखिर हमेशा उसे रस्सी की डोर पर चढ़ा,उसकी चाल पर निगाह क्यों रखी जाती है,भई चलेगी तो गिरेगी भी... सम्हलेगी भी..उसे जीने दो ।मशहूर मनोचकित्सक सिगमंड फ्रायड  का एक बयान बहुत मशहूर है कि मनोविश्लेषण के क्षेत्र में इतने साल काम करने के बाद भी मै समझ नहीं पाया कि स्त्री आखिर चाहती क्या है?” फ्रायड अपने पेशे के दौरान सैकड़ों पुरुषों और स्त्रियों के संपर्क में आए।उन दिनों स्त्रियां ही मनोचिकित्सक के पास ज्यादा आती थी।अब सभ्यता का प्रसार कुछ इस तरह से हो रहा है कि मनोचिकित्सक के यहां महिलाओं की अपेक्षा पुरुष ज्यादा आने लगे हैं।फ्रायड के लिए स्त्री हमेशा से ही रहस्य बनी रही है।स्त्री वास्तव में क्या चाहती है,यह इसलिए स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उसे अपनी मर्जी से चाहने की छूट उसे कभी नहीं मिली है..अब धीरे-धीरे परतें खुल रही है।उसे आज आज़ादी मिली है,सोचने-समझने विचरने के लिए खुला आसमान मिल रहा है..हां ये ज़रूर है कि इस राह पर कभी चलते हुए कांटे मिलते हैं तो कभी फूलों की सेज़..कभी सफलता..तो कभी असफलता..कहीं भटकाव भी हैं सदियों से पराधीन रही नारी को उड़ान भरते देखना किसी को अच्छा भी लग सकता है..किसी को बुरा भी....
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर अगर कुछ करना ही चाहते हैं तो उसके आसमान को साफ करें और उड़ान भरने में मदद करते हुए सामर्थ्यवान बनाए...संबल बनाए....साहसी बनाए..ताकि आए दिन आने वाली चुनौतियों का सामना कर सके,ताकि कोई उसे अबला समझ कर उसकी इज्जत ना लूट सके,ना ही आग के हवाले कर सके।