उड़ान पर आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है..ज़िंदगी का जंग जीतना है तो हौसला कायम रखिए..विश्वास करें सफलता आपके कदम चूमेगी..

मंगलवार, 6 मार्च 2018


आज महिलाएं घर की दहलीज से ही बाहर नहीं निकली है... बल्कि उन्होंने अपने हुनर से ये साबित कर दिया कि अंतरिक्ष में उड़ान भरने से लेकर रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने में किसी से पीछे नहीं है... हर उस काम को आज महिलाएं सफलतापूर्वक कर रही हैं जिन पर कभी पुरुषों का एकाधिकार था... राधिका कुमारी एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने केवल खुद को बल्कि अपने साथ सैकड़ों उन महिलाओं को ऐसे काम से जोड़ा जिन पर अभी तक पुरुषों का वर्चस्व था.. इनकी ही बदौलत जयपुर की सड़कों पर आज कई महिलाएं फर्राटे से रिक्शा चला रही हैं....आशा सैनी रेनू जैसी सैकड़ों महिलायें और लड़कियां जो आज अपने पैरों पर खड़ी है इनके हौसलो को पंख दिए है राधिका कुमारी ने... राधिका कहती है कि जब भी महिला ड्राइवर से मिलती हूं तब तब मुझे एहसास होता है कि महिलाओं के पास एक खास आंतरिक शक्ति होती है...वो मेहनती तो होती ही है साथ ही हर टास्क करने के लिए तैयार रहती है... राधिका कुमारी जिस कंपनी की डायरेक्टर हैं उसमें साथ काम करने वाली महिलाओं को शेयर होल्डर बनाया गया है.. ये कंपनी उन महिलाओं लिए काम करती है जो आर्थिक रूप से कमजोर है और स्लम एरिया में रहती ैं.. राधिका का मोटिवेशन ही था जिसने इनको आत्म निर्भर बनाया....आशा सैनी औऱ रेनू जैसी महिला चालक आज देश विदेश से आने वाले पर्यटकों को गुलाबी नगरी की सैर करवाती है...महिलाओं के लिए ट्रक, ट्रेन और हवाई जहाज चलाना आसान है...क्योंकि  में ना तो

पब्लिक से सीधा कोई लेन देन होता है और ना ही असुरक्षा की कोई भावना होती है... ऑटो चलाना या रिक्शा चलाना उन सबसे अलग है... ऑटो चलाने वाली महिलाओं पर घरेलू जिम्मेदारी... व्यावसायिक दबाव के साथ साथ अनापेक्षित माहौल....सड़क हादसों और समाज की बुरी नज़रों का डर एक साथ हावी रहता है...हालांकि इन महिलाओं को तैयार करना इतना आसान नहीं था....राधिका और उनके साथी कैलाश सांचोली ने कच्ची बस्तियों में जा कर इन महिलाओं को तैयार किया.. पुरूषों के वर्चस्व वाले पेशे में आने से जहाँ महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है.... वही लोगों की धारणा में भी बदलाव आने लगा है...

मंगलवार, 8 मार्च 2016

भाभी जी के बहाने...(महिला दिवस )

एंड टीवी पर आने वाले सीरियल ‘भाभी जी घर पर हैं ‘ में दो किरदार पुरुषों के और दो किरदार महिलाओं के बहुत ही मजेदार हैं..लेकिन मजे मजे में ही तमाम गंभीर मुद्दों पर चर्चा भी हो जाती है और हंसी ठहाकों के बीच इसका पता ही नहीं चलता...भभूति जी के परिवार में महिला पुरुष की बराबरी का मामला कुछ इस कदर है कि इस घर में विभू की हालत ठीक वैसी है और उसे वही उलाहने सुनने पड़ते हैं जो आम तौर पर महिलाओं को सुनना पड़ता है..मसलन विभू का किचन में दिखना..घर की सारी जिम्मेदारी निभाना..चाय काफी से लेकर खाने नाश्ते का इंतजाम....सच पूछिए बड़ा ही मजा आता है...बल्कि यूं कहें कि तमाम महिलाओं की हसरत का प्रतीक है विभू..सिर्फ काम ही नहीं विभू को वो ताने भी सुनने पड़ते हैं जो आम तौर पर महिलाओं को दिन भर कमर तोड़ घरेलू काम के बाद सुनना पड़ता है...वहीं तिवारी की पत्नी अंगूरी भाभी जो बिल्कुल ही घरेलू महिला हैं.. जिनकी दुनिया तमाम महिलाओं की तरह घर की चाहरदीवारी तक सीमित है...उसे उसका पति हमेशा यही याद दिलाता रहता है कि वो सिर्फ घर का काम ही कर सकती है बाहर की दुनिया और कमाना उसके बस की बात नहीं...
इसके अलावा दोनों पुरुष किरदारों का एक दूसरी की पत्नी से प्रेम करना और उनके लिए बिछ जाना ठीक उसी पुरुष मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें हमेशा दूसरे के घर का खाना ही अच्छा लगता है...चाहे अपने घर में खीर बिरयानी ही क्यों न पकी हो...
खैर जो भी हो हल्के फुल्के हंसी मजाक के बीच ये धारावाहिक तमाम गंभीर संदेश दे रहा है..मेरा निवेदन है कि जितने भी पुरुष इस धारावाहिक को देखते हैं उन्हें अपने घर की महिलाओं का कमतर समझना छोड़ देना चाहिए बल्कि वो हर मौका मुहैया करवाना चाहिए जिससे उनके अंदर की प्रतिभा सामने आए..और अगर ऐसा नहीं कर पाएं तो घऱ को सजाने –संवारने, परिवार बच्चों को पालने की एवज में उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश हरगिज न करें...उन्हें सम्मान दें कि क्योंकि ये दर्द विभूति नारायण मिश्रा से बेहतर कोई नहीं समझ सकता...वहीं महिलाओं के लिए भी सीख और सबक है कि अगर आपका साथी आपको न सिर्फ मौका दे रहा है बल्कि आपको पूरी इज्जत नवाज रहा है तो आप भी मर्यादा का ख्याल रखते हुए समाज में पति की इज्जत बनाए रखें...पति-पत्नी..महिला-पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं..दोनों एक सवारी के दो पहिए हैं...
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सभी महिलाओं के साथ सभी पुरुषों को भी बधाई...क्योंकि उनके साथ और सहारे के बिना कुछ कदम चल तो सकते हैं लेकिन दौड़ नहीं सकती...(पिता,भाई,पति,दोस्त, प्रेमी..चाहे वो किसी भी रुप में हो) ठीक यही शर्त पुरुषों के लिए भी लागू होती है..
महिलाओं की भागीदारी और उनकी तरक्की को स्पर्धा की तरह न देंखे बल्कि संबल के रुप में समाज –परिवार की बेहतरी के लिए एक दूसरे के साथ चलें...क्योंकि अभी तो कोसों दूर चलना है.....

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

सशक्त महिलाओं में शुमार चंदा


हौसले की वजह से ही चंदा कोचर आज तमाम महिलाओं की आदर्श हैं...
आईसीआईसी बैंककी सीईओ चंदा कोचरका नाम आज शक्तिशाली महिलाओं की सूची में शामिल हैं। मैनेजमेंट ट्रेनी की छोटी सी पोस्ट से बैंक के उच्चतम पद तक पहुंचने वाली चंदा की सफलता महिला सशक्तिकरण का एक आदर्श उदाहरण है। आज चंदा कई महिलाओं की प्रेरणा हैं। उनके जज्बे और मेहनत से उन्हें आगे बढ़ने की सीख मिलती है। 

फोर्ब्स पत्रिका में दुनिया की सशक्त महिलाओं की सूची में जगह बनाने वाली चंदा का जन्म 17 नवंबर 1961 को जोधपुर, राजस्थान में हुआ। उनकी स्कूली पढ़ाई जयपुर से हुई। इसके बाद वे मुंबई आ गईं जहां पर जय हिन्द कॉलेज से उन्होंने आर्ट्स में स्नातक की डिग्री हासिल की। 

1982 में स्नातक की डिग्री लेने के बाद उन्होंने मुंबई के जमनालाल बजाज इंस्टिट्यूट ऑफ बिजनेस स्टडी से मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल की। चंदा हमेशा ही ब्राइट स्टूडेंट रहीं, मैनेजमेंट स्टडी में अपने शानदार परफॉर्मेन्स के लिए उन्हें वोकहार्ड्ट गोल्ड मेडल और कॉस्ट एकाउंटेंसी में सर्वाधिक अंक के लिए जेएन बोस गोल्ड मेडल दिया गया। 

1984 में मास्टर डिग्री लेने के बाद चंदा ने आईसीआईसीआई बैंक में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में प्रवेश किया और अपने काम और अनुभव के साथ-साथ वे लगातार आगे बढ़ती गईं। उन्होंने आईसीआईसीआई बैंक को सफलता के नए आयामों तक पहुंचाया। उनके नेतृत्व में ही बैंक ने अपने रीटेल बिजनेस की शुरुआत की। 

बैंकिंग के क्षेत्र में अपने योगदान के कारण चंदा को कई अवॉर्डों से नवाजा गया जिसमें भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला तीसरा सबसे बड़ा पुरस्कार पद्म विभूषण शामिल है। इसके साथ ही वे उन दो महिलाओं में एक हैं जो‍ कि इंडियन डॉमेस्टिक बैंक की हेड हैं। चंदा ने आईसीआईसीआई बैंक को एक बड़े रीटेल फाइनेंसर के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

कई महिलाओं की प्रेरणास्त्रोत होने के साथ-साथ चंदा आज कई युवाओं की भी आदर्श हैं। जिनकी सफलता की कहानी से आज युवा आगे बढ़ने की सीख लेते हैं।..साभार वेबदुनिया

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

क्या आपके इलाके में डायन है ?

आज भी भारत में डायन जिंदा हैं....पहले बिजली नहीं था अंधेरा था 

इसलिए डायने होती थी...उस समय समय बिताने के लिए बतकही के 

अलावा कुछ और नहीं होता था इसलिए डायने होती थी..और भी 

तमाम वजहों से डायन होती थी...लेकिन जब अब जहां बिजली नहीं है 

वहां भी टीवी देखी जाती है तो बड़ी हैरत होती है कि आखिर तमाम 

तरह की दिन भर की मसालेदार खबरें,धारावाहिक होने के बावजूद 

कहां वक्त है कि डायन पैदा हो जाए....ये सब मुझे इसलिए कहना 

पड़ रहा है कि झारखंड के रांची के मांडर इलाके के कनीजिया गांव में 

एक दो नहीं बल्कि पांच-पांच डायने मिली हैं..वो भी जिंदा..ऐसे में 

सभी को अपने बच्चों और परिवार वालों का ख्याल रखना है...इसलिए 

गांववालों ने लाठी-डंडों से पीटकर पांचों को मार डाला...लेकिन हैरत 

की बात है कि जानी सुनी बातों के मुताबिक एक ही डायन पूरे गांव 

को खा जाने के लिए काफी होती है..पांचों ने किसी को खाया नहीं 

बल्कि सिर्फ लाठी-डंडों से ही मर भी गई...गोली-बंदूक..तांत्रिक किसी 

की जरूरत नहीं पड़ी...

ये गांव कोई बहुत सुदूर इलाके में भी नहीं है..बल्कि प्रदेश की 

राजधानी रांची से मात्र 20 किलोमीटर दूर है..मिली जानकारी के 

मुताबिक इन सभी डायनों की उम्र 32 से 50 साल के बीच है..अच्छा 

गांववालों ने उन्हें सिर्फ पीट-पीट कर मारा ही नहीं बल्कि उनके शवों 

को (शायद डायनों के शव भी होते होंगे या नहीं जो भी हो..) बोरे में 

भरकर गांव के बाहर फेंक दिया...फिर भी इन डायनों ने कुछ नहीं 

किया...क्या डायनें इंसानों से अधिक संवेदनशील या नख विहीन हो 

चुकी हैं...कहते हैं भूत-पिशाच के कैटेगरी की ही होती हैं डायने..इनके 

पास अपार शक्ति होती है..बावजूद इसके किसी गांववाले को खरोंच 

तक नहीं आई..इनमें गजब की ताकत होती है..नाराज यानि गुस्सा 

आने पर वह एक साथ कई लोगों को पछाड़ सकती हैं...लेकिन पांच-

पांच डायने इन गांववालों को बाल बांका भी नहीं कर सकी...इसका 

साफ मतलब ये निकाल लें कि तथाकथित सभ्य इंसान ज्यादा खूंखार 

हो चुका है..बनिस्पत डायनों के..हाय रे..मुझे तो अब इन इंसानों से 

डर लगने लगा है..इतना कुछ हो रहा था लेकिन किसी भी डायन ने 

लाल आंखे तरेरते हुए हवा में उड़ने की कोशिश नहीं की..औऱ ना ही 

किसी बच्चे तक को अपनी लंबी-लंबी नखों से चीरा....ना ही उनके मुंह 

में इंसानी खून दिखाई दिया..बल्कि खुद ही इस बुरी तरह घायल हो 

गई कि सिर्फ मुंह और सिर ही नहीं बल्कि शरीर के हर उस जगह से 

खून की फौहारे निकलने लगी जहां जहां लाठी पड़ी..हाय रे कनीजिया 

गांव के नौनिहालों वीरों जवानों तुम तो डायनों से अधिक खतरनाक 

निकले..आखिर तुम लोगों ने आज के आधुनिक जमाने में वो कर 

दिखाया जो शायद पुराने जमाने के अंधविश्वास से जकड़े समाज के 

लोग नहीं कर पाएं थे....इस गांव के सभी वीरों का ना सिर्फ सम्मान 

होना चाहिए बल्कि डायन भूत प्रेत पिशाच से पीड़ित हर उस जगह 

भेजने के लिए स्वात टीम की तर्ज पर इनका एक टॉस्क फोर्स बना 

देना चाहिए....देखिएगा हमारा दावा है कि न सिर्फ भारत से भूत 

पिशाच डायन का नाश होगा बल्कि विदेशों में भी इनकी सेवा ली 

जाएगी...

ये पांचों डायने मर चुकी है बावजूद इसके डर इतना अधिक है कि 

पुलिस को शव भी कब्जे में लेने का विरोध किया गया...और तो और 

गांव के कब्रगाह में उन्हें दफनाने का भी विरोध किया है..

अब जरा इस तथ्य पर गौर फरमा लें कि आखिर इन गांव वालों को 

कैसे पता चल गया कि उनके गांव में डायनों ने डेरा डाल लिया 

है...हुआ कुछ यूं कि कुछ दिन पहले गांव में दो तीन अधेड़ उम्र के 

लोगों की अज्ञात वजह से मौत हो गई थी...इसे माना गया कि डायनों 

की वजह से मौत हुई है..इतना ही नहीं डायनों के पड़ोस में रहने वाले 

एक युवक की पीलिया से मौत हो गई..बस क्या था...पहले एक डायन 

को पीटने से शुरु हुआ मामला चार और डायनों तक जा पहुंचा...डायनें 

बेचारी कुछ समझ पाती इससे पहले ही पांचों को डायनों को गांव के 

ही रणबांकुरों ने मार डाला...मारने वालों में कई इन्हें दीदी..भाभी और 

चाची भी कहते थे...अचानक पांचों डायन बन गई और प्रकोप फैलाने 

लगी तो गांववालों का फर्ज बनता था कि इनसे गांव को मुक्ति 

दिलाई जाए....

इतनी बड़ी घटना हो गई और जरा टीवी वालों को देखो...यूं तो हर 

छोटी बड़ी बात पर लाल-लाल गोले दिखाकर चिल्ला चिल्ला कर 

दिखाएंगे...लेकिन रांची के कनीजिया गांव वालों की इतनी बड़ी बहदुरी 

दिखाने की जहमत न की...मुझे लगता है आजकल साध्वी राधे मां के 

पुण्य प्रताप का दोहन करने में जुटी है मीडिया...अरे वहां थोड़ी 

लाली—चमकीली ज्यादा है ना....इसलिए इन वीरों की गाथा नहीं दिखा 

पाई....लेकिन घबराने की कोई बात नहीं..ये दल जल्द ही कुछ और 

जगहों पर धावा बोलने वाला है..जैसे ही कोई नई डायन हाथ लगी..तो 

कसम से देर नहीं लगेगी...सबको बुला लेंगे...फिर देखना हमारी ताकत 

के आगे कैसे घुटने टेकती हैं ये डायनें....

रविवार, 1 मार्च 2015

बजट में मानवता तो नहीं सिखा सकते..


रेल बजट में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने कई वीमन फ्रेंडली घोषणाएं की हैं..महिलाओं की सुरक्षा के लिए ट्रेन के डिब्बों में सीसीटीवी लगाने की योजना है..इसके अलावा छेड़खानी और उत्पीड़न के मामलों में लगाम कसने के लिए पहली बार 182 हेल्पलाइऩ नंबर शुरु किया जाएगा..महिलाएं किसी समस्या के लिए चलती ट्रेन से भी शिकायत दर्ज करवा सकेंगी...बॉयो शौचालय और गर्भवती महिलाओं के लिए सीट वगैरह वगैरह...लेकिन जिस समय प्रभु बजट की इन योजनाओं से जनता को रुबरु करवा रहें थे कमोबेश उसी समय लालगढ़ से गुवाहाटी जा रही अवध असम एक्सप्रेस में एक महिला तीन घंटे तक प्रसव पीड़ा झेलती रही...हरियाणा के गुड़गांव से बैजू राय पत्नी अंजू के साथ होली मनाने के लिए समस्तीपुर जिले के लिलिचैता गांव जा रहे थे. वे दिल्ली से बुधवार को अवध असम एक्सप्रेस पर सवार हुए.गुरुवार सुबह गाड़ी सीवान पहुंची तो अंजू को प्रसव पीड़ा शुरु हो गई,छपरा आऩे पर बैजू ने टीटीई और गार्ड को मेडिकल सुविधा मुहैया करवाने का आग्रह किया.दोनों ने सोनपुर में सुविधा उपलब्ध करवाने का आश्वासन दिया..लेकिन गाड़ी सोनपुर से आगे निकल कर हाजीपुर पहुंच गई. ..महिला के पति ने रास्ते में गार्ड और टीटीई से कई बार आरजू मिन्नत की.लेकिन उन्होंने बीच में पड़ने वाले किसी स्टेशन पर ट्रेन नहीं रोकी.चलती ट्रेन में ही बच्चे का जन्म हो गया और, इलाज के अभाव में मासूम ने मुजफ्फरपुर जंक्शन पर ट्रेन पहुंचने से कुछ देर पहले दम तोड़ दिया. मुजफ्फरपुर में अंजू के परिजनों को स्टेशन के बाहर एक दुकान से बेंच मांगकर लानी पड़ी..उस पर लिटाकर वे उसे अस्पताल ले गए..इस घटना के बाद गुस्साए यात्रियों ने स्टेशन पर जमकर हंगामा मचाया.
इस पूरे वाकये में महिला के पति और ट्रेन में सवार यात्रियों के साथ साथ ट्रेन के टीटीई और गार्ड सभी की भूमिका पर गौर फरमाए तो उस बच्चे की मौत के जिम्मेदार सभी हैं..क्या किसी ने भी बीच के स्टेशन पर ट्रेन रोकने या फिर मेडिकल सुविधा के बारे में मानवता से विचार क्यों नहीं किया ? रेल मंत्री अपने बजट में चाहे तमाम योजनाएं गिनवा दें लेकिन क्या गार्ड और टीटीई को मानवता का पाठ भी पढ़ा पाएंगे..और जो भले मानुस यात्री बच्चे की मौत के बाद स्टेशन पर हंगामा कर रहे थे..ये समय रहते क्यों नहीं किया..ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि किसी को भी प्रसव पीड़ा से तड़प रही महिला की पीड़ा का अंदाजा ही नहीं हुआ..ऐसा वाक्या पहली बार नहीं हुआ है..अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती हैं..और तो और बड़े या मध्यम स्टेशनों पर इतनी सुविधा भी नहीं  कि ट्रेन से उतारकर अस्पताल तक ले जाने के लिए कोई स्ट्रेचर या व्हील चेयर की सुविधा हो....इस 3 घंटे के बीच में टीटीई या गार्ड ने स्टेशन पर मेडिकल सुविधा के लिए सूचित तक नहीं किया..
क्या अब हम उम्मीद करें कि आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं से साबका नहीं होगा.. आखिर कोई भी बजट में मानवता का पाठ तो नहीं पढ़ाएगा....मानवता से बड़ा कोई भी जीवन में धर्म नही होता है , मगर इंसान मानवता के धर्म  को छोड़कर खुद के बनाये  हुए धर्मो पर चल पड़ता है..उसके लिए मरने-मारने को भी तैयार है..लेकिन हम उस नन्हें फरिश्ते की जान नहीं बचाना चाहते जिसने दुनिया में आंख खोली हो.....इंसान  इंसानियत को छोड़कर  धर्म की आड़ में  अपने अन्दर वैर , निंदा, नफरत, अविश्वास, जाती-पाति के भेद  के कारण अभिमान को प्रथामिकता  देता  है... इसी वजह से  मानव मूल मकसद को भूल जाता है, मानव जीवन में प्यार,स्नेह,ममता जैसे शब्दों के महत्व को भूल गया है, अपने मकसद को भूल गया है, आज धर्म के नाम पर लोग लहू -लुहान हो रहे है.. लेकिन अपने आस पास के माहौल को सुधारने के लिए हमेशा किसी समाज सुधारक का इंतजार करते रहते हैं...हमें अब भी वक्त रहते चेत जाने की जरुरत है नहीं तो गुंडे-बदमाशों से जूझ रही लड़की या फिर प्रसव पीड़ा से तड़पती एक महिला और उसके नवजात के लिए कुछ करने से पहले अगर इसी तरह हिचकते रहें तो कोई हेल्प लाइन कभी भी काम नहीं आएगा...चाहे कितने ही ऐप हमारी मुट्ठियों में रहे.


शनिवार, 14 दिसंबर 2013

welcome back

बड़े दिनों बाद सभी को मेरा नमस्कार..काफी दिनों से कुछ पोस्ट नहीं कर पाई,इसका अफसोस है...लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरे ब्लॉग से जुड़े लोग फिर से मेरे साथ जुड़ेंगे...आजकल का जो राजनीतिक परिदृश्य दिल्ली में है...उसे लेकर आम जनता में आम आदमी पार्टी 'आप' से   गुस्सा बढ़़ रहा है.......अरविंद .केजरीवाल   को..ऐसा नहीं है कि उन्हें अपनी पार्टी के जीते उम्मीदवारों की कमियां खामियां या स्किल पता नहीं है लेकिन वो अपनी इस जीत को बरकरार रखना चाहते हैं कि आखिर सरकार बनाने के बाद उसकी चुनौतियों से कैसे निपटेंगे.....उन्हें डर है कि कहीं दिल्ली दरबार में फंसकर ना रह जाएं और  2014 लोकसभा चुनाव में कुछ खास न कर पाएं..शायद यही डर उन्हें दिल्ली में सरकार बनाने से रोक रहा है..लेकिन अरविंद जी को  अपने हौसले को बरकरार रखना चाहिए  ऐसी मेरी सलाह है और जी जान से जुट जाना चाहिए जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए क्योंकि जितना अधिक समय सोचने में लगाएंगे उतना ही जनता का भरोसा उन पर से कम होता जाएगा..क्योंकि विरोधी इसी ताक में बैठे हैं.....आप अपनी
टीम पर भरोसा जताइए क्योंकि कभी तो ककहरा सीखना ही होगा....कल का इंतजार करने की बजाए आज ही रण में उतर जाईए और कुछ कर दिखाइए.....क्योंकि उड़ान हौसलो की होती है....
 

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

मुझे समझ नहीं आ रहा

नमस्कार,बहुत दिन हो जा रहे हैं आजकल..कुछ लिखने का समय नहीं निकाल पा रही हूं....जानती हूं कि ये ठीक नहीं है..बहुत  तेजी से ब्लॉग का संसार फल फूल रहा है...ऐसे में इतना gap ठीक नहीं है....जबकि इस बीच महिलाओं और समाज को लेकर इतना कुछ हो गया....तमाम खबरों के बीच संबंध बनाने को लेकर उम्र का तनाव बेमतलब ही नौजवानों को दे दिया सरकार ने.....क्या कभी ये चीजें उम्र की सीमा में बंधकर हुई हैं...या होती हैं..या कभी होंगी..बेकार ही तमाम बुद्धजीवियों ने अपनी जुबान और दिमाग दोनों को खर्च किया...टीवी चैनल पर बहस होता रहा....लेकिन अभी तक मुझे समझ में नहीं आया कि आखिर ऐसी क्या जरुरत आ पड़ी थी सरकार को कि इस मुद्दे को उछाल दिया....अगर आप लोगों को समझ में आया हो तो मुझे जरुर बताइएगा..कोशिश करुंगी अलग-अलग नजरिए को समझने की....